Monday, November 17, 2014

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुए नसबंदी कांड में अब तक 14 महिलाओं की मौत हो चुकी है और 33 अभी भी गंभीर हालत में हैं! परिवार नियोजन के लिए गई महिलाएं तो मौत के मुंह में जा चुकी हैं लेकिन पीछे छोड़ गयी हैं कई अनगिनत सवाल...... जिनका जवाब प्रशासन और चिकित्सक एक दूसरे पर मढ़ रहे हैं! पहला सवाल तो सरकारी योजनाओं पर लग रहा है जिस जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से सरकार देश भर में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम चला रही है वही बेअसर साबित होकर लोगों को लील गया! जिस डॉक्टर आर के गुप्ता को रमन सरकार ने 50 हजार से अधिक नसबंदी ऑपरेशन करने का रिकॉर्ड बनाने पर पुरुष्कृत किया, उसी डॉक्टर ने सरकार की योजना पर कलंक लगा दिया और एक नसबंदी कैंप में सबसे अधिक महिलाओं की मौत का एक और रिकॉर्ड अपने और शायद छत्तीसगढ़ सरकार के नाम कर दिया! आपको बता दें आरोपी डॉक्टर गुप्ता ने 5 घंटे में 83 ऑपरेशन कर दिये!
 
सबसे बड़ा प्रश्न तो यही खड़ा हो रहा है कि बेचारा गरीब आदमी सरकार की योजनाओं पर विश्वास करेगा ? सरकार पर भरोसा करके फिर से मौत की दहलीज पर जाएगा? यदि नहीं जाएगा तो देश की जनसंख्या नियंत्रण का क्या होगा? और यदि जाएगा तो उसे कितनी हिम्मत बटोरनी पड़ेगी ?
शायद प्रदेश और देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है जब एक साथ इतनी सारी महिलाओं की मौत नसबंदी ऑपरेशन की वजह से हुई है! लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी लेगा कौन? 
 
  नसबंदी कांड....एक और रिकॉर्ड ???
वह डॉक्टर, जिसे भगवान का रूप समझकर उन महिलाओं ने खुद को उसके हवाले कर दिया था! डॉक्टर पर इतना विश्वास करके गाँव की गरीब, अनपढ़ महिलाएं अस्पताल की उस दहलीज पर गईं थी जिसे वह नया जीवनदाता समझती थीं! लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि भगवान समान डॉक्टर सिर्फ प्रोफेशनल तरीके से काम करेगा! यदि उसका काम सर्जरी है तो सिर्फ सर्जरी ही करेगा! और अपनी ज़िम्मेदारी भूल जाएगा! क्योंकि ये डॉक्टर का ही कहना है कि उसका काम सिर्फ सर्जरी करना था! अस्पताल में साफ-सफाई-सुरक्षा देखना सरकार और प्रशासन का काम है! तो क्या कोई डॉक्टर इतना गैर जिम्मेदार हो सकता है कि रिकॉर्ड बनने के चक्कर में या सरकारी काम निपटाने के चक्कर में अपने मरीज को अपने ही हाथों से मार डालेगा ? और साथ ही ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर गुप्ता ने ये भी स्वीकारा कि गलत दवाइयों के चलते महिलाओं की मौत हुई है जबकि उसने ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया था! 
 
तो अब सवाल उठता है कि डॉक्टर ने दवाइयों को जाँचने की जहमत क्यों नहीं उठाई ? जब यह सर्वविदित है कि भारत में सरकारी काम भगवान भरोसे हैं तो क्या डॉक्टरों की ज़िम्मेदारी नहीं बनती थी कि ऑपरेशन के समय महिलाओं को दी जाने वाली दवाइयों को चेक कर लिया जाये! क्या एक बार फिर रिकॉर्ड बनाने की इतनी धुन सवार थी कि दवाइयों को चेक करना जरूरी नहीं समझा!
 
या फिर प्रशासन, जो सिर्फ आंकड़े दिखाने के लिए योजनाएँ चलाते हैं! कैंप लगाए, डॉक्टर्स नियुक्त किए और हो गया काम ? अस्पताल की सुरक्षा-व्यवस्था, साफ-सफाई, दवाइयों की एक्सपायरी डेट देखना उसका काम नहीं! आपको बता दें जिस नेमिचन्द अस्पताल में ये नसबंदी कांड हुआ है वो पिछले एक साल से बंद था! और ऑपरेशन होने के बावजूद भी वहाँ साफ-सफाई नहीं थी! संभवतया गंदी,मैली अस्पताल के चलते संक्रामण फैल जाने की वजह से मौत हुई है! साथ ही इतनी तादात में सरकारी कैंप में हुई मौतों के बाद भी सरकार गंभीर नहीं दिख रही है! 
 
क्योंकि अभी भी कई महिलाओं की हालात गंभीर है, और वे लगातार उल्टी,दस्त की समस्या से झूज़ रही हैं और डॉक्टरों को भी बीमारी का कारण पता नहीं होने के कारण वे साधारण दवाइयाँ दे रहे हैं! डॉक्टर्स कल्चर रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं तभी मौत के कारणों का पता लग पाएगा! तो क्या यहाँ, सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि इतने गंभीर मामले में जल्दी रिपोर्ट मँगवाएँ और कम से कम जो महिलाएं ऑपरेशन के बाद बची हुई हैं, उनकी जान की ही हिफाजत कर ली जाये!

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