Thursday, February 26, 2015

महिला जींस : रेप या सुरक्षा ?

 
                                   महिला जींस : रेप या सुरक्षा ?
 
1 December 2014
आज पूरे देश में रोहतक की दो बहनों द्वारा तीन मनचलों की बस में पिटाई का मामला छाया हुआ है वहीं हरियाणा सरकार ने उन्हें उनके साहस और वीरता के लिए 26 जनवरी पर सम्मान देने की घोषणा की है! जहां देश में खाप पंचायतें, कुछ राजनेता और कुछ संगठन महिलाओं को जींस पहनने को रेप का कारण मानते हैं वहीं इन दो बहादुर बहनों ने कहा कि यदि वे जींस नहीं पहने होती तो शायद वे उन मनचलों का मुक़ाबला नहीं कर पाती! इन दो बहादुर बहनों ने कहा वे जींस पहने थी इसलिए अपनी सुरक्षा कर सकीं वरना सलवार सूट तो कब का फट चुका होता!
 
सवाल उठता है कि महिलाओं का पहनावा विशेष रूप से जींस पर इतना बवाल क्यों होता है? जींस रेप के लिए जिम्मेदार है या सुरक्षा देती है? 
 
यदि जींस पहनने के कारण रेप की घटनाएँ होती हैं तो फिर 2-3 साल की छोटी बच्चियों या फिर अधेड़ महिलाओं से या 6 मीटर की साड़ी में लिपटी महिलाओं से रेप क्यों होते हैं? 
 
क्या जींस या महिलाओं का पहनावा ही रेप के लिए उत्तरदायी है?
 
या फिर समाज की घटिया सोच, रेपिस्ट को बढ़ावा देती है?
 
एक तरफ कुछ नेता कहते हैं कि महिलाओं की जींस उकसाती है तो क्या जब उनकी बीवी,बेटियाँ जींस पहनती है तो भी वे बेकाबू हो जाते हैं? ? लड़कियों का पहनावा रेप करने के लिए नहीं उकसाता बल्कि रेपिस्ट की घटिया और छोटी सोच रेप के लिए उकसाती है! वरना इस तरह के बयान देने वाले लोग अपनी बेटी और बीवी की जींस और दूसरे की बेटी और बीवी की जींस में अंतर नहीं करते!
 
तुगलकी फरमान देने वाली पंचायतें या महिलाओं के पहनावे को लेकर बेतुकी टिप्पणी करने वाले राजनेता और संगठन अपनी छोटी सोच क्यों नहीं बदलते? लड़कों पर पाबंदी क्यों नहीं लगाते जिस भारत देश में नारी की पूजा होती थी आज वहीं उसकी अस्मिता तार – तार होती है! महिला को देवी नहीं भोग की वस्तु समझा जाने लगा है! जब तक इंसान अपनी संकीर्ण मानसिकता के दायरे से बाहर नहीं आयेगा, अपनी सोच नहीं बदलेगा! जब तक पुरुष सत्तात्मक समाज रहेगा! 
 
लड़के-लड़कियों में भेदभाव बना रहेगा! लड़कों की हर गलती को माफी और लड़की की छोटी सी गलती को पाप समझा जाएगा, तब तक देश और समाज तरक्की नहीं कर सकता! आखिर हम क्यों अपने को आधुनिक समाज कहते हैं जबकि सोच आज भी संकीर्ण हैं!  
 
हमारा समाज समानता का दंभ भरता है! लेकिन आज भी लड़के और लड़कियों के बीच एक गहरी खाई है! माँ-बाप कभी बेटे पर बन्दिशें नहीं लगाते लेकिन बेटी पर तमाम तरह के कायदे-कानून लाद दिये जाते हैं! क्योंकि बेटी तो घर की इज्जत है तो फिर बेटा आवारा है जिसकी सब गलतियाँ माफ होंगी ??
 
आज का जमाना वह है जहां घर की चौखट से बाहर निकलकर महिलाएं भी समाज में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं! देश की तरक्की में योगदान दे रही हैं! अब ऐसे में घर की दीवार से बाहर महिलाएं अपनी सुविधा के हिसाब से अपने कपड़ों का चयन करती है जिसमें उन्हें जींस आरामदायक पहनावा लगता है तो इसमें गलत क्या है?

राष्ट्रीय बालिका दिवस..चुनौती..या..शपथ

 
                       राष्ट्रीय बालिका दिवस..चुनौती..या..शपथ
 
24 Jaunuary 2015
21वीं सदी में जब भारत मंगल पर पहुँच चुका है, उसके बावजूद भी देश में बेटियों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। आधुनिक तकनीक के युग में भी बेटियों को बचाने के लिए प्रधानमंत्री को मंच से बेटियों की सुरक्षा का आव्हान करना पड़ रहा है। हमारे देश में सदियों से बेटियों को बोझ समझा जाता रहा है। भले ही वे देश और समाज की तरक्की में लाख योगदान दें लेकिन आज के तथाकथित पढ़े-लिखे समाज में आज भी बेटियों को गर्भ तक में जीने नहीं दिया जा रहा है। वे इस दुनिया में आँख खोलें, उसके पहले ही उन्हें माँ की कोख में शांत कर दिया जाता है, इसे रोकने के लिए वर्तमान सरकार और पिछली कई सरकारें लगातार कन्याओं की सुरक्षा के लिए एक से बढ़कर योजनाएँ चला रही हैं।
 
आज के दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है। 24 जनवरी को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी देश के सर्वोच्च पद पर बैठीं थीं, इसलिए नारी शक्ति को नमन करने आज के दिन को मनाया जाता है। लेकिन इसके परिणाम बहुत सार्थक नहीं है। वर्तमान में तो नारी जाति की स्थिति और भी गंभीर हो गयी है। पहले के जमाने में तो लोग बेटियों को इसलिए मारते थे कि अभिभावकों को उनके विवाह के लिए दहेज की चिंता सताती थी और उनकी शादी होने तक असामाजिक तत्वों से बेटियों की सुरक्षा की चिंता सताती थी लेकिन आज के जमाने में तो कन्या भ्रूण हत्या को डॉक्टरों तक ने अपना पेशा बना लिया है। 
 
आज कुछ डॉक्टर्स अधिक पैसा कमाने के लिए प्रतिबंध के बावजूद भी सोनोग्राफी सेंटर दम से चला रहे हैं और लिंग परीक्षण के लिए आई महिला से मोटी रकम बसूल रहे हैं और ऐसे डॉक्टर दंपत्ति को समझाने के वजाय कन्या भ्रूण हत्या करने में बिलकुल भी नहीं हिचकिचाते हैं। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" कहा जाता है जहां नारी की पूजा होती हैं, सुख, समृद्धि और देवता बसते हैं। इसलिए जरूरत हैं नारी को सम्मान और सुरक्षा देने की, उसे जीवन जीने का अधिकार देने की। एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में लिंग अनुपात बहुत तेजी से बिगड़ा है। प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है। जहां ये अनुपात इतना अधिक बिगड़ा है वहीं देश में बेटियों की कमी हो गयी है। ये आंकड़े चिंताजनक है कि देश में बड़ी तादात में कुँवारे लड़कों की फौज है जिन्हें अपनी जीवनसंगिनी नहीं मिल पा रही हैं।
 
ये सोचने वाला मुद्दा है कि यदि बेटी को जीने ही नहीं दिया जाएगा तो बहू कहाँ से लाओगे ? ये समाज के लिए बहुत बड़े खतरे की घंटी है…. अभी भी वक्त है...... चेत जाने का......संभाल जाओ......वरना लड़कियों की कमी से कुल के कुल....वंश के वंश खत्म हो जाएँगे......! जब लड़कों की शादी ही नहीं होगी तो अगली पीड़ी कैसे बढ़ाओगे ????  माँ चाहिए...पत्नी चाहिए......फिर बेटी क्यों नहीं.....???? 
 
आज समाज को जरूरत है यह समझने की बेटियाँ बोझ नहीं है,वे ताकत हैं। बेटियों को भी बेटे के समान अवसर मिले तो वे बेटों को भी पीछे छोड़ दें। हमारे समाज में ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जिन्होने देश का नाम गर्व से ऊंचा किया।  इतिहास में तो नारी शक्ति के रज़िया सुल्ताना, जोधा बाई, रानी लक्ष्मी बाई, अहिल्याबाई ढेरों उदाहरण हैं। लेकिन वर्तमान सदी में भी नारी शक्ति के उदाहरणों की कमी नहीं है। चाहे देश में शासन संभालने की बात हो या प्रशासन, पर्वतों पर चढ़ना हो या समुंदरों को पार करना हो, आसमान में प्लेन उड़ाना हो या जमीन पर ट्रेन या बस या ट्रक-टैक्सी चलाना हो, दुश्मनों से सीमा पर मोर्चा लेना हो या समाज में पुलिस व्यवस्था संभालना हो, देश का भविष्य गड़ने के लिए शिक्षक बनना हो या इमारतों के निर्माण के लिए इंजीनियर बनान हो।
 
यान को मंगल पर भेजना हो या पृथ्वी पर गाड़ी दौड़ानी हो.....महिलाओं ने हर उस क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं जहां पुरुषों का वर्चस्व समझा जाता था। देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी, पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, पहली महिला स्पीकर मीरा कुमार, पहली आईपीएस अफसर किरण बेदी , पहली विकलांग भारतीय महिला अरुणिमा सिन्हा , एशि‍या की पहली महिला ट्रेन डीजल इंजन ड्राइवर मुमताज अली हैं। वर्तमान में महिला शक्ति के इतने उदाहरण है कि लिखने के लिए पेज भी कम पड़ जाये। लेकिन हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना बताना है कि 
 
जीने का उसको भी अधिकार, चाहिए उसे थोडा सा प्यार।
जन्म से पहले न उसे मारो, कभी तो अपने मन में विचारो।
शायद वही बन जाए सहारा, डूबते को मिल जाए किनारा॥
 
आइए, तो एक बार फिर हम आज के दिन शपथ लें कि कन्या भ्रूण हत्या नहीं करेंगे, उन्हें भी जीने का अधिकार देंगे। बेटी को भी उच्च शिक्षा और जीने का अधिकार देंगे क्यों वे भी हैं कुदरत का अनमोल उपहार.........  
 
बेटी कुदरत का उपहार, नहीं करो उसका तिरस्कार !
जो बेटी को दे पहचान, माता-पिता वही महान !!

हम तो बदल गए....अब है पुरुषों की बारी.......

हम तो बदल गए....अब है पुरुषों की बारी.......

महिलाएं तो अक्सर ही पुरुषों के बीच चर्चा का विषय रहती हैं और उससे भी अधिक महिलाओं के कपड़े पुरुषों को ध्यान खींचते हैं! हाल ही में हिन्दू महासभा के नेता नवीन त्यागी ने फिल्मों में छोटे कपड़े पहनकर आइटम सॉन्ग करने वाली अभिनेत्रियों को वेश्या करार देने की मांग की है साथ ही स्कूल,कॉलेज में लड़कियों के जींस और मोबाइल पर पाबंदी की मांग की है! यह पहला मौका नहीं है जब महिलाओं के कपड़ों को लेकर, महिलाओं की स्वतन्त्रता को लेकर इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है और न ही यह कोई नई बात है क्योंकि आखिर आज भी यह समाज पुरुष प्रधान समाज ही हैं! भले ही लाख दुहाई दें कि हम आधुनिक युवा है, 21वीं सदी के स्वतंत्र नागरिक हैं लेकिन समाज के कतिपय ठेकेदार इस सोच पर ताला जड़ा रहना देना चाहते है!
लेकिन अब समय आ गया है जब पुरुषों की इस घटिया मानसिकता पर लगाम लगाई जाए! आखिर एक सिक्के के दो पहलू मर्द और औरत इस धरती पर दो अलग ध्रुवों की तरह कैसे रह सकते हैं? लेकिन ये भी सही है कि यदि पुरुष नहीं बदले तो महिलाओं को बदलना होगा! पुरुषों के दिमाग में ये बात बिठानी होगी कि “आदमी की फितरत ही......ऐसी होती है....” गलत है! आपकी फितरत......ऐसी है....तो उसे बदलो! अब और अधिक अपने मूर्खतापूर्ण कुतर्कों से कि आदमी बाय डिफॉल्‍ट, बाय नेचर ऐसे ही हैं, हमें और अधिक मूर्ख नहीं बना सकते! अब महिलाएं बदल रही हैं! जमाना बदल रहा है! आपको भी बदलना होगा!
महिलाओं को भी अपनी आज़ादी से जीने का हक़ है! लेकिन किसी और पुरुष को हक़ नहीं कि उनकी आज़ादी, उनके पहनावे पर रोक लगाएँ! महिलाओं पर बन्दिशें लगाने के पहले अपनी घटिया मानसिकता को ताला लगाएँ और खुले दिमाग से, विस्तृत नजरिए से महिला के अस्तित्व को स्वीकार करें! महिलाएं पुरुषों के हाथ की कठपुतली नहीं कि उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल किया जाये! महिलाएं भोग की वस्तु नहीं है! उनका भी वजूद है, उनका भी अस्तित्व है, उनकी भी खुशियाँ है जिसे जीने का उन्हें पूरा हक़ है न कि पुरुषों के हिसाब से खुद की सीमाएं तय करने का!
आखिर कब तक महिलाएं टैग के सहारे जिएंगी ? कब तक पुरुष प्रधान समाज उन्हें किसी न किसी परिभाषा में बांधे रहेगा ? कब तक महिलाओं को दूसरों की पसंद पर अपना जीवन गुज़ारना होगा? कब तक ये समाज महिलाओं को किसी न किसी कैटेगरी में बिठाती रहेगी?
महिलाएं बेटी,बहन,पत्नी, माँ, भाभी, ननद सभी किरदार निभाती हैं, स्वीकारा! लेकिन ये भी तो स्वीकारना होगा कि इन सब से ऊपर वह एक महिला है! उसका खुद का अस्तित्व है! उसे खुद का जीवन खुद की तरह से जीने का हक़ है! उसे खुद का करियर, खुद का प्रोफेशन चुनने का हक़ है! एक तरफ देश मंगल पर पहुँच गया है और आज भी महिलाओं को अपने कपड़े चुनने तक का हक़ नहीं मिला है! ये समाज की पराकाष्ठा है! आज भी महिलाओं को श्रेणियों में बांटा जाता है! आज भी उन्हें टैग देकर परिभाषित किया जाता है!
यदि वे सजती सँवरती हैं तो, वे बनावटी है! यदि वे मेकअप नहीं करती तो बहन जी है! यदि वे अच्छे कपड़े पहनती हैं, तैयार होती है, तो दिखावटी हैं! यदि वे खुद पर ध्यान नहीं देती तो देहाती है! यदि महिलाएं अपने मन की इच्छा, अभिलाषा, अरमान जाहिर करती है तो उन्हें अभद्र भाषा से नवाजा जाता है! यदि वे कुंठित रहती हैं, अपने अरमानों की अभिव्यक्ति नहीं करती हैं तो कहा जाता है एटीट्यूड प्रॉबलम! यदि महिलाएं अपना दुख आंसुओं में निकालती हैं तो ड्रामा क्वीन कहा जाता है! यदि दुख व्यक्त नहीं करती तो पत्थर की मूर्ति कहा जाता है! यदि महिलाएं विपरीत लिंग, पुरुषों से दोस्ती करती हैं तो उन्हें चीप की संज्ञा दी जाती है और यदि नहीं करती हैं तो संकीर्ण मानसिकता का, करार दे दिया जाता है! यदि वे खुद के हक़ के लिए आवाज उठाती हैं तो तेज, झगड़ालू कहलाती हैं! और यदि वे अन्याय सहन करती हैं तो मूर्ख कहलाती हैं! आखिर कब तक...और कब तक...... ये समाज महिलाओं को अलग अलग खांचों में बंद कर रखेगा ? अब समय आ गया है कि महिलाओं के अस्तित्व को स्वीकार करो! उन्हें परिभाषित करना बंद करो! वरना महिलाओं ने तो आगे बढ़ना सीख लिया है! अकेले ज़िंदगी भी व्यतीत कर ही लेंगी, वो भी खुशी-खुशी....वे आत्म निर्भर हो रही हैं.......सजग हो रही हैं! खुद के वजूद को पहचान रही हैं! खुद से प्यार करने लगी हैं!
लेकिन अंत में यही कहना चाहेंगे कि स्वतन्त्रता का अर्थ किसी की सीमा का उल्लंघन नहीं है!

सिंगल हैं तो क्या गम.....जी ले जरा......

सिंगल हैं तो क्या गम.....जी ले जरा......

आज-कल कॅरियर में उड़ान भरने के चलते लोग शादी पर ध्यान नहीं देते हैं और एक समय बाद वे इतने महत्वकांक्षी हो जाते हैं कि उन्हें अपना मनपसंद जीवन साथी नहीं मिल पाता! फिर अकेलापन उन्हें खाने लगता है! कुछ लोग अकेलेपन के कारण डिप्रेस भी रहने लगते हैं और कुछ लोग गलत संगत में पड़ जाते हैं! या ड्रग एडिक्ट होने लगते हैं! लेकिन सिंगल होने के अपने ही मजे हैं!

सिंगल रहने पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं रहती है! आप मस्ती से अपनी ज़िंदगी को एंजॉय कर सकते हैं! आप अपने निर्णय लेने के लिए भी आज़ाद होते हैं! कोई रोकटोक भी नहीं होती है! लेकिन फिर भी पति या बॉय फ्रेंड नहीं होने का गम सालता है तो परेशान होने की जरूरत नहीं है! आप कुछ बातों को ध्यान में रख कर अपनी ज़िंदगी को बेहतर बना सकते हैं और सिंगल होने का लुत्फ उठा सकते हैं!

सिंगल रहने पर इन बातों का रखें ध्यान .....
1: आत्म निर्भर बनें
ज़िंदगी जीने के लिए सबसे जरूरी है वित्तीय आत्म निर्भरता! आप यदि वित्तीय रूप से आत्म निर्भर हैं तो जिंदगी की आधी परेशानी वैसे ही खत्म हो जाती है! इसलिए पैसों को भी महत्व दें!

2: सेविंग करें
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है, बचत! यदि आप अपने पैसों को सही तरह से निवेश करती हैं और पैसे बचाती हैं तो आपके बुरे वक्त में ये बहुत कारगर होगा!

3: नए दोस्त बनाए
दोस्ती जिंदगी का महत्वपूर्ण रिश्ता होता है! दोस्तों के साथ समय व्यतीत करें! दोस्तों के साथ पार्टी एंजॉय करें! आउटिंग पर जाएँ, मूवी देखने जाएँ! दिल को अच्छा लगेगा!

4: कुछ रचनात्मक करें
कुछ रचनात्मक काम करें! कुछ ऐसा करें जिससे दिल खुश हो जाये! जो आपको खुशी दे!

5: हॉबी डेवेलप
कुछ नया सीखे! कुछ नया सीखना भी आपको जिंदगी में नयापन देता है! इसके लिए आप वक्त निकाल कर कोई हॉबी क्लास भी जॉइन कर सकती हैं! आपको नए दोस्त, नया वातावरण मिलेगा! कुछ नया मिलेगा तो ज़िंदगी में भी नयापन आयेगा!

6: चेरिटी करें
आप जो कमाते हैं उसका कुछ हिस्सा दान करें! यह आत्म संतोष देता है! किसी जरूरतमन्द की मदद करें या फिर किसी एनजीओ से जुड़कर काम करें! बृद्धाश्रम या अनाथालय जाकर भी दूसरों को खुशियाँ दे सकती है! दूसरों को खुशियाँ देने से दूनी खुशी खुद को मिलती है!

7: मेडिटेशन
यदि आध्यात्म की तरफ झुकाव है तो मेडिटेशन, योगा शुरू करें! ये जीवन में स्फूर्ति भरेगा! नई ऊर्जा का संचार करेगा जिससे जिंदगी में भी नयापन आयेगा!

8. सबसे महत्वपूर्ण खुद से प्यार करना सीखें…..
और ज़िंदगी में सबसे महत्वपूर्ण है तो वो है “खुद से प्यार” हम ज़िंदगी की भाग दौड़ में कभी खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं! दूसरों को खुश रखने के लिए भी पहले खुद को खुश रखना सबसे अहम है! आप किसी को तभी खुश रख सकोगे जब आप खुश रखोगे! खुद से प्यार करना शुरू करो! खुद के लिए जीना शुरू करो! जिंदगी खुद-ब-खुद खूबसूरत हो जाएगी!

जिंदगी जीने के लिए शादी या पार्टनर होना ही जरूरी नहीं! और भी गम हैं जमाने में! इसलिए क्यों न खुद के लिए जी लें जरा.........