राष्ट्रीय बालिका दिवस..चुनौती..या..शपथ
24 Jaunuary 2015
21वीं सदी में जब भारत मंगल पर पहुँच चुका
है, उसके बावजूद भी देश में बेटियों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। आधुनिक
तकनीक के युग में भी बेटियों को बचाने के लिए प्रधानमंत्री को मंच से
बेटियों की सुरक्षा का आव्हान करना पड़ रहा है। हमारे देश में सदियों से
बेटियों को बोझ समझा जाता रहा है। भले ही वे देश और समाज की तरक्की में लाख
योगदान दें लेकिन आज के तथाकथित पढ़े-लिखे समाज में आज भी बेटियों को गर्भ
तक में जीने नहीं दिया जा रहा है। वे इस दुनिया में आँख खोलें, उसके पहले
ही उन्हें माँ की कोख में शांत कर दिया जाता है, इसे रोकने के लिए वर्तमान
सरकार और पिछली कई सरकारें लगातार कन्याओं की सुरक्षा के लिए एक से बढ़कर
योजनाएँ चला रही हैं।
आज के दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप
में मनाया जाता है। 24 जनवरी को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा
गांधी देश के सर्वोच्च पद पर बैठीं थीं, इसलिए नारी शक्ति को नमन करने आज
के दिन को मनाया जाता है। लेकिन
इसके परिणाम बहुत सार्थक नहीं है। वर्तमान में तो नारी जाति की स्थिति और
भी गंभीर हो गयी है। पहले के जमाने में तो लोग बेटियों को इसलिए मारते थे
कि अभिभावकों को उनके विवाह के लिए दहेज की चिंता सताती थी और उनकी शादी
होने तक असामाजिक तत्वों से बेटियों की सुरक्षा की चिंता सताती थी लेकिन आज
के जमाने में तो कन्या भ्रूण हत्या को डॉक्टरों तक ने अपना पेशा बना लिया
है।
आज कुछ डॉक्टर्स अधिक पैसा कमाने के लिए
प्रतिबंध के बावजूद भी सोनोग्राफी सेंटर दम से चला रहे हैं और लिंग परीक्षण
के लिए आई महिला से मोटी रकम बसूल रहे हैं और ऐसे डॉक्टर दंपत्ति को
समझाने के वजाय कन्या भ्रूण हत्या करने में बिलकुल भी नहीं हिचकिचाते हैं।
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" कहा जाता है जहां नारी की
पूजा होती हैं, सुख, समृद्धि और देवता बसते हैं। इसलिए जरूरत हैं नारी को
सम्मान और सुरक्षा देने की, उसे जीवन जीने का अधिकार देने की। एक रिपोर्ट
के अनुसार, देश में लिंग अनुपात बहुत तेजी से बिगड़ा है। प्रति हजार पुरुषों
पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है। जहां ये अनुपात इतना अधिक बिगड़ा है वहीं
देश में बेटियों की कमी हो गयी है। ये आंकड़े चिंताजनक है कि देश में बड़ी
तादात में कुँवारे लड़कों की फौज है जिन्हें अपनी जीवनसंगिनी नहीं मिल पा
रही हैं।
ये सोचने वाला मुद्दा है कि यदि बेटी को
जीने ही नहीं दिया जाएगा तो बहू कहाँ से लाओगे ? ये समाज के लिए बहुत बड़े
खतरे की घंटी है…. अभी भी वक्त है...... चेत जाने का......संभाल
जाओ......वरना लड़कियों की कमी से कुल के कुल....वंश के वंश खत्म हो
जाएँगे......! जब लड़कों की शादी ही नहीं होगी तो अगली पीड़ी कैसे बढ़ाओगे
???? माँ चाहिए...पत्नी चाहिए......फिर बेटी क्यों नहीं.....????
आज समाज को जरूरत है यह समझने की बेटियाँ
बोझ नहीं है,वे ताकत हैं। बेटियों को भी बेटे के समान अवसर मिले तो वे
बेटों को भी पीछे छोड़ दें। हमारे समाज में ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है
जिन्होने देश का नाम गर्व से ऊंचा किया। इतिहास में तो नारी शक्ति के
रज़िया सुल्ताना, जोधा बाई, रानी लक्ष्मी बाई, अहिल्याबाई ढेरों उदाहरण हैं।
लेकिन वर्तमान सदी में भी नारी शक्ति के उदाहरणों की कमी नहीं है। चाहे
देश में शासन संभालने की बात हो या प्रशासन, पर्वतों पर चढ़ना हो या
समुंदरों को पार करना हो, आसमान में प्लेन उड़ाना हो या जमीन पर ट्रेन या बस
या ट्रक-टैक्सी चलाना हो, दुश्मनों से सीमा पर मोर्चा लेना हो या समाज में
पुलिस व्यवस्था संभालना हो, देश का भविष्य गड़ने के लिए शिक्षक बनना हो या
इमारतों के निर्माण के लिए इंजीनियर बनान हो।
यान को मंगल पर भेजना हो या पृथ्वी पर गाड़ी
दौड़ानी हो.....महिलाओं ने हर उस क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं जहां पुरुषों
का वर्चस्व समझा जाता था। देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी, पहली महिला
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, पहली महिला स्पीकर मीरा कुमार, पहली आईपीएस
अफसर किरण बेदी , पहली विकलांग भारतीय महिला अरुणिमा सिन्हा , एशिया की
पहली महिला ट्रेन डीजल इंजन ड्राइवर मुमताज अली हैं। वर्तमान में महिला
शक्ति के इतने उदाहरण है कि लिखने के लिए पेज भी कम पड़ जाये। लेकिन हमारा
उद्देश्य सिर्फ इतना बताना है कि
जीने का उसको भी अधिकार, चाहिए उसे थोडा सा प्यार।
जन्म से पहले न उसे मारो, कभी तो अपने मन में विचारो।
शायद वही बन जाए सहारा, डूबते को मिल जाए किनारा॥
आइए, तो एक बार फिर हम आज के दिन शपथ लें
कि कन्या भ्रूण हत्या नहीं करेंगे, उन्हें भी जीने का अधिकार देंगे। बेटी
को भी उच्च शिक्षा और जीने का अधिकार देंगे क्यों वे भी हैं कुदरत का अनमोल
उपहार.........
बेटी कुदरत का उपहार, नहीं करो उसका तिरस्कार !
जो बेटी को दे पहचान, माता-पिता वही महान !!
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