16 दिसंबर 2014/2012
एक काला दिन पाकिस्तान और भारत के इतिहास
में...एक तरफ पाक में सोमवार 16 तारीख को बाल संहार हुआ वहीं दो साल पहले इसी
काले दिन दिल्ली की सड़क पर दामिनी की चीख़ों से हिंदुस्तान हिल गया लेकिन आज तक
संभल नहीं सका। पाकिस्तान का 16 दिसंबर भारत के लिए चेतावनी दे गया कि अभी भी
संभल जाओ...वरना इस तरह हिन्दुत्व के लिए जबरन धर्म परिवर्तन और कट्टरवादिता
फैलाने से वो दिन दूर नहीं जब भारत में भी धर्म के नाम पर मार काट मचेगी। धर्म
निरपेक्ष देश में जबरन हिन्दुत्व को थोपना और संस्कृति के नाम पर दंगे और तोडफोड
करना, सांप्रदायिकता फैलाना, भारत जैसे सर्वधर्म समभाव देश को शोभा नहीं
देता। आखिर पाकिस्तान में मंगलवार 16 दिसंबर बालसंहार किसका परिणाम था? राजनीति, धर्म और दहशतगर्दी
का घालमेल? शायद हाँ! यदि पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर कट्टरवादिता की फसल नहीं
हुई होती और न ही राजनीतिक ताकतों द्वारा आतंकियों को पनाह दी गयी होती। इंसान को
इंसान समझा गया होता। भारत के दर्द को भी पाकिस्तान ने महसूस किया होता। भारत के
खिलाफ आतंक को रोकने में सहयोग दिया होता तो पाकिस्तान को ये काला दिन कभी नहीं
देखना होता। लेकिन पाकिस्तान शुरू से ही भारत के खिलाफ आग उगल रहा है। आतंक की खेप
भारत में पहुंचा रहा है। सीमा पर घुसपैठ कर रहा है। मुस्लिमों को भारत के खिलाफ
भड़का रहा है।
कहते हुए दुख को
रहा है कि पाकिस्तान ने जो बोया है, वही काट रहा है। हम बालसंहार की भर्त्सना करते
हैं लेकिन इस बात को कहने से भी गुरेज नहीं कि जो दूसरों के लिए गड्डा खोदता है, वह उसमें खुद
गिरता है। लेकिन अभी भी वक्त है कि पाकिस्तान को संभल जाना चाहिए और कट्टरवादी सोच
पर लगाम लगाकर दहशतगर्दों को राजनीतिक संरक्षण देना बंद करना चाहिए। वहीं
पाकिस्तान के वर्तमान हादसे से भारत को भी चेत जाना चाहिए जिस तरह आतंकी, इस्लाम के नाम पर
मासूम लोगों का ब्रेन वॉश करते हैं और उन्हें इस्लाम को लेकर कट्टर बनाते हैं वैसा
ही कुछ भारत में भी हो रहा है। भारत में भी हिन्दुत्व कट्टरवादिता को लेकर आवाज़ें
बुलंद होने लगी हैं। धर्म के नाम पर कुछ कथित हिंदुवादी संगठन देश में उपद्रव करते
हैं। प्रेम के प्रतीक वेलेंटाइन डे पर आगजनी और तोडफोड करते हैं। संस्कृति की
दुहाई देकर भले ही वे काले कारनामे पर्दे के पीछे करे लेकिन दुनिया के सामने प्रेम
जाहिर करने वालों पर अत्याचार करते हैं, ये भारत की संस्कृति नहीं है। वहीं देश में चल
रहे कथित धर्म परिवर्तन और घर वापसी कार्यकम भी कहीं से भी भारत की संस्कृति को
नहीं दर्शाता।
“धर्म का अर्थ धारण” करना होता है न कि
जबरन धर्म में परिवर्तन कराना। लेकिन ये हिन्दुत्व के नाम पर कट्टरवादिता है जो
लोगों को जबरन धर्म परिवर्तन करा रही है। एक तरफ हम मदरसों का विरोध करते हैं कि
वे मुस्लिमों को कट्टरवादिता की तालीम देते हैं लेकिन वहीं संघ की हिन्दुत्व को
बढ़ावा देने वाली किताबों को भी देश के स्कूलों में पढ़ाने की वकालत कर रहे है
जिनमें जन्मदिन पर केक काटने और मोमबत्ती बुझाने का बहिष्कार किया गया है। वहीं
गीता को भी राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की बात कर रहे हैं लेकिन हमें यहाँ एक बात
गौर करना चाहिए कि जिस तरह पाकिस्तान में कुछ कट्टरपंथियों ने ईश निंदा का कानून
बनवा दिया, जिसके तहत अल्लाह या कुरान की निंदा करने वालों को फांसी का प्रावधान है, ऐसे ही भारत में
यदि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित कर दिया गया तो जो गीता को नहीं मानेगा, या गीता की आलोचना
करेगा, वह देशद्रोही होगा और उसके खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान होगा। लेकिन सवाल उठता
है, जिस देश में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है, धर्म निरपेक्षता
है, वहाँ किसी एक विशेष किताब को राष्ट्रीय दर्जा देना है तो फिर अन्य धर्मों के
धार्मिक ग्रन्थों ने क्या बिगाड़ा है? आखिर सभी धर्म की शिक्षा तो एक ही है। कोई भी
धर्म, अधर्म करने के लिए नहीं कहता।
नई सरकार आने से
भारत में भी कुछ हिन्दू कट्टरवादी संगठन भारत के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे
हैं वहीं सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं लेकिन आज जरूरत है लोगों को इंसानियत
का पाठ पढ़ाने की, एक अच्छा नागरिक बनाने की। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सम्मान देने की न कि
कुछ सांप्रदायिक ताकतों के आगे नतमस्तक होने की। हम आज भी 16 दिसंबर 2012 के दामिनी गैंग
रेप को नहीं भूले हैं और न ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए संवेदनशील हुए हैं। ऐसे
में जरूरत हैं धार्मिक उन्माद को बढ़ावा न देकर भारत के संविधान की इज्जत की जाये
और धर्म निरपेक्ष राष्ट्र को चरितरार्थ किया जाये। अंत में ....
इतनी शक्ति हमें
देना दाता,
मन का विश्वास
कमजोर हो ना,
हम चले नेक रास्ते
पर,
हमसे भूलकर भी कोई
भूल हो ना!
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